Tuesday, April 28, 2020



ज़र से की इबादत,  तो कोई ज़ामिन ना हुआ। 
इबारत से की इबादत, तो कोई ज़ाकिर ना हुआ। 
बेसबब इबादत का हिसाब ना देना दोस्तों, 
इश्क़ की इबादत से ही ज़ाहिर ख़ुदा हुआ। 

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ज़र- सोना 
ज़ामिन- धर्मपिता
इबारत- बोली, रचना
ज़ाकिर- भगवान की प्रशंसा की कविता

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